Description
वाल्मीकि रामायण के उस प्रसंग पर ब्रजभाषा काव्य, जिसमें हनुमान श्रीराम की मुद्रिका जानकी तक पहुँचाते हैं और उनकी चूड़ामणि लेकर लौटते हैं। ‘ईश’ जी का संकल्प था कि रत्नाकर के ‘उद्धवशतक’ की तरह ऐसा काव्य रचा जाए जिसमें ब्रजभाषा की परंपरा के साथ काशी की बोली का पुट भी रहे। नौ वर्षों में पूरा हुआ यह ग्रंथ जब उन्होंने सभा में सुनाया — मैथिलीशरण गुप्त की अध्यक्षता में — तो श्रोता तीन घंटे तक तन्मय रहे। कवि इसे छपा हुआ न देख सके; राय कृष्णदास की आत्मीय भूमिका के साथ यह काशी की उस काव्यधारा का अंतिम दीप है जिसे भारतेंदु और रत्नाकर ने जलाया था।




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