नागरीप्रचारिणी सभा का इतिहास
नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना 16 जुलाई सन् 1893 को हिंदी भाषा और साहित्य तथा देवनागरी लिपि की उन्नति तथा प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से की गई थी। इस सभा की स्थापना का विचार क्वींस कॉलेज वाराणसी के नवीं कक्षा के तीन छात्रों; बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने कॉलेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की थी। सभा का प्रधान कार्यालय वाराणसी में और इसकी शाखाएँ नई दिल्ली और हरिद्वार में हैं। इस सभा के प्रथम अध्यक्ष भारतेंदु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास थे। हिंदी साहित्य की उल्लेखनीय प्रवृत्तियों के नियमन, नियंत्रण और संचालन में सभा का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस तरह 131 वर्षों से यह सभा लगातार अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
पुस्तकालय और वाचनालय स्थापित करने के साथ ही सभा ने इसके अंतर्गत हिंदी का एक सर्वांगपूर्ण पुस्तकालय और वाचनालय संघटित किया। इस समय सभा का आर्यभाषा पुस्तकालय देश में हिंदी पुस्तकों के सर्वश्रेष्ठ संग्रह के रूप में सुविख्यात है। साहित्य का उच्चतम अध्ययन करने वाले विद्वानों और विश्वविद्यालयों के शोध छात्रों के लिये यह आर्यभाषा पुस्तकालय हमेशा से ही सहायतार्थ रही है। हिंदी की मुद्रित पुस्तकों के अतिरिक्त प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों एवं अँगरेज़ी, संस्कृत तथा अन्यान्य भारतीय भाषाओं के सहायक एवं संदर्भ ग्रंथों का संग्रह यहाँ है।
प्रकाशन इस सभा की दूसरी मुख्य प्रवृत्ति है। भिन्न-भिन्न विषयों की उत्तमोत्तम ग्रंथों (लगभग 400) का प्रकाशन अब तक सभा कर चुकी है जिनमें कतिपय ग्रंथ तो ऐतिहासिक महत्व के हैं; जैसे, हिंदी शब्दसागर (जो हिंदी का सर्वश्रेष्ठ कोश है), हिंदी व्याकरण, हिंदी साहित्य का इतिहास, हिंदी वैज्ञानिक शब्दावली, कचहरी हिंदी कोश, इत्यादि।
सभा का आर्यभाषा पुस्तकालय देश में हिंदी पुस्तकों का सबसे बड़ा पुस्तकालय है । इसकी मुख्य विशेषता यह है कि आरंभिक काल की प्रायः समस्त मुद्रित पुस्तकें तथा प्रमुख पत्र-पत्रिकाएँ यहाँ सुरक्षित हैं तथा वे सार्वजनिक उपयोग के लिये सर्वदा अध्येताओं को सुलभ रहती हैं । साथ ही, अप्रकाशित हस्तलिखित ग्रंथों का भी विशाल संग्रह है जिसका अवलोकन हिंदी में शोधकार्य के लिये अनिवार्य है ।
पुस्तकालय का श्रीगणेश नागरीप्रचारिणी सभा ने अपनी स्थापना के प्रथम वर्ष (स. 1950) में ही कर दिया था । दूसरे वर्ष अर्थात् संवत् 1951 वि. से यह पुस्तकालय नियमित रूप से सभा के सभासदों के उपयोग में आने लगा । उस समय इसका नाम ‘नागरी भंडार’ था । संवत् 1953 में स्व. श्री गदाधर सिंह का ‘आर्यभाषा पुस्तकालय’सभा के ‘नागरी भंडार’ के साथ मिलाया गया और इस संयुक्त संग्रह का नाम भी ‘आर्यभाषा पुस्तकालय’ रखा गया । तब से यह पुस्तकालय इसी नाम से हिंदी की सेवा करता आया है । इस पुस्तकालय की संपन्नता और सर्वश्रेष्ठता का श्रेय मुख्यतः हिंदी के ग्रंथ-प्रकाशकों, लेखकों, हिंदीप्रेमियों तथा राज्य सरकारों को है जिन्होंने सदा से ग्रंथों, पत्र-पत्रिकाओं तथा द्रव्य से इसकी सहायता की है । इस समय पुस्तकालय में कुल मिलाकर 4000 से अधिक पुस्तकें हैं जिनमें हिंदी के मुद्रित ग्रंथों के अतिरिक्त संस्कृत तथा अँगरेजी के लगभग 2000 आकर ग्रंथ एवं लगभग 4000 दुष्प्राप्य और अलभ्य हस्तलिखित ग्रंथ हैं ।
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