Description
अनन्य हिंदी-सेवी स्वामी सत्यदेव परिव्राजक की बहुत लोकप्रिय रचना। इसमें नॉर्वे-निवासी 140 वर्षीय एक महामुनि की कथा है, जिन्होंने हिमालय में वर्षों साधना कर लहसुन के प्रयोग से कायाकल्प की विधि पाई थी। स्वामीजी ने हरिद्वार का अपना ‘सत्यज्ञान निकेतन’ आश्रम और अपनी सभी पुस्तकों का कॉपीराइट नागरीप्रचारिणी सभा को दान कर दिया था; यह पुस्तक सभा की ‘सत्यज्ञान ग्रंथमाला’ में प्रकाशित है।




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