नागरीप्रचारिणी सभा का प्रतीक-चिह्न

नागरीप्रचारिणी सभा, काशीस्थापना 1893 · Est. 1893

PL. · सभा के प्रकाशन

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सभा के प्रकाशन — पुस्तकें, पत्रिकाएँ, पुनर्मुद्रणBooks and journals published by the Sabha since 1893

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नागरीप्रचारिणी सभा, काशीEst. 1893

सभा परिचयAbout the Sabha

PL. I · आर्यभाषा पुस्तकालय भवन

नागरीप्रचारिणी सभा का भवन, विश्वेश्वरगंज, वाराणसी

The Sabha's building, home of the Aryabhasha Library

सभा परिचय · ABOUT

I

स्थापना

Foundation

नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना क्वींस कॉलेज, वाराणसी की नवीं कक्षा के तीन छात्रों—बाबू श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने इसी कॉलेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की. बाद में इसकी स्थापना की तिथि इन्हीं महानुभावों ने 16 जुलाई 1893 निर्धारित की और आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास इसके पहले अध्यक्ष हुए. काशी के सप्तसागर मुहल्ले में घुड़साल में इसकी बैठकें होती थीं और बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना. पहले ही बरस जो लोग इसके सदस्य बने, उनमें महामहोपाध्याय पंडित सुधाकर द्विवेदी, इब्राहिम जॉर्ज ग्रियर्सन, अंबिकादत्त व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे विद्वान थे.

16 · VII · 1893
FIG. Iछात्रावास का बरामदा, जहाँ तीन छात्रों ने सभा की नींव रखी
II

स्थापना का उद्देश्य

The purpose

जब इस संस्था की स्थापना की गई तो इसका उद्देश्य हिंदी और नागरी लिपि का राष्ट्रव्यापी प्रचार एवं प्रसार था, उस समय न्यायालयों में या अन्यत्र सरकारी कामों में हिंदी का प्रयोग नहीं हो सकता था और हिंदी की शिक्षा की व्यवस्था वैकल्पिक रूप से मध्यविद्यालय की पाठशालाओं तक ही सीमित थी. हिंदी में आकर ग्रंथों का पूर्ण रूप से अभाव था. प्रेमसागर, बिहारी सतसई, तुलसीकृत रामायण और मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत जैसे ग्रंथ ही आकर-ग्रंथ माने जाते थे, जो जहाँ-तहाँ मध्यविद्यालय में वैकल्पिक रूप से पढ़ाए जाते थे. भारतेंदु और उनकी मित्रमंडली का साहित्य केवल साहित्यकारों के अध्ययन और चिंतन तक सीमित था. नागरीप्रचारिणी सभा ने अपनी स्थापना के 7वें वर्ष अर्थात सन् 1900 तक कई महत्वपूर्ण कार्य पूरे किये.

पद्मावततुलसीकृत रामायणबिहारी सतसईप्रेमसागरअ
FIG. IIउस समय के गिने-चुने आकर-ग्रंथ
III

हिंदी का पहला सत्याग्रह

The first satyagraha for Hindi

सरकार से हिंदी प्रदेशों के 60,000 विशिष्ट नागरिकों ने देवनागरी लिपि में हिंदी के प्रयोग की अनुमति सरकार तथा न्यायालयों में पंडित मदनमोहन मालवीय और बाबू श्यामसुंदर दास के नेतृत्व में माँगी जिनमें हिंदी प्रदेश के राजा-महाराजाओं और विद्वानों का सहयोग था. यह आन्दोलन खूब चला. सरकार को नागरी लिपि की वैज्ञानिकता के संबंध में प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया जो देवनागरी लिपि को संसार की सबसे अधिक वैज्ञानिक लिपि सिद्ध करने वाला पहला विस्तृत प्रामाणिक और सर्वमान्य दस्तावेज़ है. इस आंदोलन में सभा के अनेक कार्यकर्ता गिरफ्तार किये गये और यह माना जाता है कि यह हिंदी के लिए पहला सत्याग्रह था. सभा इस अनुष्ठान में सफल रही.

नागरी60,000
FIG. IIIसाठ हज़ार नागरिकों की अर्ज़ी
IV

हिंदी हस्तलेखों की खोज

The search for Hindi manuscripts

बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी को अंग्रेज़ सरकार ने यह अधिकार दिया था कि संस्कृत के हस्तलिखित ग्रंथों की वह देश में खोज करें और उसकी विवरणात्मक सूची बनायें. सभा ने सरकार से यह अनुरोध किया कि इस खोज में जो हिंदी की पुस्तकें मिलें उनकी सूची मात्र एशियाटिक सोसाइटी प्रकाशित करे. इस सोसाइटी ने यह कार्य बेमन से साल-दो-साल किया. फिर हिंदी के लिए यह कार्य सभा को इस शर्त पर सौंपा गया कि इसका विवरण सभा प्रकाशित कर सकती है किन्तु वह अंग्रेज़ी में होगा तथा सरकार की ओर से छपेगा. सभा ने इसे स्वीकार कर लिया और हिंदी हस्तलेखों की खोज के इस काम का शुभारंभ किया. गाँव-गाँव, नगर-नगर उसके कार्यकर्ताओं ने मिले हस्तलेखों का विवरण त्रैवार्षिक रूप में प्रकाशित करना आरंभ किया जिनमें लाखों हस्तलेखों का विवरण 'सभा' प्रकाशित कर चुकी है. ये खोजें बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश आदि में की गईं. ये खोजें और विवरण हिंदी की अनन्य संपत्तियाँ हैं, जिनके बिना अनुसंधान का काम असंभव है. इसी प्रसंग में संस्था ने हिंदी हस्तलेखों का इतना विशाल संग्रह सभा के पुस्तकालय में कर लिया जितना एक स्थान पर संसार में कहीं नहीं है; जिसमें 25,000 हस्तलेख संस्कृत के भी हैं, जिसके अध्ययन-अध्यापन के लिए विश्वभर से शोधछात्र और विद्वान सभा में आते हैं.

हस्तलेख
FIG. IVडोरी से बँधी पोथी — खोज का मूल
बिहारउत्तर प्रदेशपंजाबराजस्थानमध्य प्रदेश
FIG. IV.Bगाँव-गाँव, नगर-नगर — बिहार से मध्य प्रदेश तक हस्तलेखों की खोज

एशियाटिक सोसाइटी ने भारतीय भाषाओं में सबसे विशाल काव्यग्रंथ चंदबरदाई की कृति पृथ्वीराज रासो का प्रकाशन आरंभ किया, जो किसी पुराण से भी बड़ा काव्यग्रंथ है, पर विवाद के कारण इसके कुछ खंडों का प्रकाशन कर एशियाटिक सोसाइटी मौन हो गई. इस काम को सभा ने अपने ऊपर उठाया और सन 1904 के शुरुआत कर कुछ ही वर्षों में इस 3000 पृष्ठों के ग्रंथ को प्रकाशित किया.

V

स्वतंत्रता से पूर्व

Before Independence

20वीं सदी के आरंभ के बाद सभा की मान्यता और उसके कृतित्व को सारे राष्ट्र में सम्मानित किया जाने लगा और भारत की महान विभूतियों का सहयोग और सान्निध्य इसे प्राप्त होने लगा. इनमें सभी वर्गों के लोग थे. स्वतंत्रता से पूर्व के उसके कुछ महत्वपूर्ण कार्य इस प्रकार हैं :

पत्रिका · सरस्वती · शब्दसागर
FIG. Vपत्रिका, सरस्वती और शब्दसागर — छपे हुए ज्ञानकार्य
  1. 1905
    NPS / V.1काशी भाषा सम्मेलनThe Kashi language conference

    सन् 1905 में, काशी में कांग्रेस अधिवेशन के अवसर पर एक भाषा सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता सर रमेशचन्द्र दत्त ने की और उसमें नागरीप्रचारिणी सभा के प्रांगण में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने यह घोषणा की कि हिंदी ही भारत की भाषा हो सकती है और देवनागरी लिपि वैकल्पिक रूप से भारत की सभी भाषाओं के लिए प्रयुक्त की जानी चाहिए और यह कार्य सभा को करना चाहिए. तब से सभा निरन्तर प्रगति के नये आयाम इस दिशा में ढूँढती और करती रही.

  2. 1908
    NPS / V.2संरक्षक और सहयोगीPatrons and supporters

    सर आशुतोष मुखर्जी सभा के न्यासी मण्डल के अध्यक्ष बने और बाद में लाला लाजपतराय इस पद पर आये. सर तेजबहादुर सप्रू ने उस युग में सभा की आर्थिक एवं नैतिक सहायता की जो तब कई सहस्त्र रुपयों की थी. पंडित गोविन्दवल्लभ पंत सन् 1908 से प्रतिमाह 1.50 रुपये से सभा की सहायता करने लगे और उन्होंने अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन की शुरुआत अपनी संस्था प्रेम सभा को नागरीप्रचारिणी सभा से संबद्ध करके की. उस समय के राजा-महाराजाओं में काशी नरेश, उदयपुर, ग्वालियर, खेतड़ी, जोधपुर, बीकानेर, कोटा, बूँदी, रीवाँनरेश आदि ने जहाँ इसे सहायता पहुँचाई, वहीं कर्मवीर मोहनदास करमचंद गाँधी ने भी इसकी कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सहायता की और सन् 1934 में यंग इंडिया में उन्होंने सभा की सहायता के लिए अपने हस्ताक्षर से अपील की. पंडित मोतीलाल नेहरू ने भी सभा की धन से सहायता की. सी. वाई. चिन्तामणि ने विधान परिषद् में सभा के भाषा के संबंध में विचारों का बराबर समर्थन किया तथा सर सुंदरलाल आदि ने इसकी भरपूर सहायता की.

  3. 1897
    NPS / V.3नागरीप्रचारिणी पत्रिकाNagari Pracharini Patrika

    हिंदी की सबसे प्राचीन शोध पत्रिका नागरीप्रचारिणी पत्रिका है जिसका सारे संसार के खोज जगत में अद्भुत मान है. यह सन् 1897 से निकल रही है. यह स्मरणीय है कि इस पत्रिका के सम्पादक मण्डल में बाबू श्यामसुन्दरदास, गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी', विद्यालंकार, डॉक्टर संपूर्णानंद, आचार्य नरेंद्रदेव, हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान विद्वान् रहे हैं.

  4. NPS / V.4सरस्वतीSaraswati

    सरस्वती हिंदी की आदि नियामक पत्रिका है जिसका शुभारम्भ नागरीप्रचारिणी सभा ने किया और 3 वर्षों तक उसका सम्पादन वह करती रही और बाद में आचार्य पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी को इसका सम्पादन-भार सौंपा.

  5. NPS / V.5आर्यभाषा पुस्तकालयThe Aryabhasha Library

    सभा ने हिंदी में आर्यभाषा पुस्तकालय की स्थापना की जिसमें हज़ारों पत्र-पत्रिकाओं की फाइलें, लगभग 50,000 हस्तलेख और हिंदी के अनुपलब्ध ग्रंथों का विशाल संग्रह है जिसे और भी सुसंपन्न बनाया है डॉ श्यामसुंदर दास, पंडित रामनारायण मिश्र, अज्ञेयजी के पूज्य पिता हीरानन्द शास्त्री, मायाशंकर याज्ञिक, डॉक्टर संपूर्णानंद, नंददुलारे वाजपेयी, पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र', कृष्णदेवप्रसाद गौड़ 'बेढब बनारसी', आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी आदि के अवदान ने इन्होंने अपना सारा पुस्तकालय इसे समर्पित किया. संसार-भर के शोधार्थी इसका लाभ उठाते रहे हैं.

  6. 1904
    NPS / V.6हिंदी शब्दसागरThe Hindi Shabdasagar

    'सभा' ने 20वीं शती के प्रारंभ में यह प्रयत्न किया कि हिंदी का एक शब्दकोश अधुनातन वैज्ञानिक शैली पर तैयार किया जाए. सन् 1904 में यह कार्य आरंभ हुआ और 25 वर्षों के अथक प्रयत्न से इसे पूरा किया गया जिसके संपादक थे बाबू श्यामसुंदर दास ‘बी.ए’ और सहायक संपादक मंडल में थे हिंदी जगत के शीर्षस्थ विद्वान् श्री बालकृष्ण भट्ट, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, श्री अमीर सिंह, श्री जगन्मोहन वर्मा, लाला भगवानदीन एवं श्री रामचंद्र वर्मा. यह कोश उस युग में भी आज की ही भाँति आधुनिक भारतीय भाषाओं का सबसे अधिक विस्तृत और प्रमाणिक माना जाता था.

  7. NPS / V.7वैज्ञानिक शब्दावलीScientific terminology

    विज्ञान और विविध विषयों पर नागरीप्रचारिणी सभा ने भारत-भर के विद्वानों के सहयोग से वैज्ञानिक शब्दावली की रचना की तथा विज्ञान के विषयों पर गंभीर किताबों का लेखन आरंभ कराया.

  8. 1910
    NPS / V.8हिंदी साहित्य सम्मेलनThe Hindi Sahitya Sammelan

    नागरीप्रचारिणी सभा ने सन् 1910 में अपने प्रांगण में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की और इस हिंदी साहित्य सम्मेलन से ही दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा, उद्भूत हुई. हिंदी साहित्य और भाषा की लगभग 60 संस्थाएँ इससे संबद्ध हैं.

  9. NPS / V.9व्याकरण और इतिहासA grammar and a history

    नागरीप्रचारिणी सभा की सदस्यता प्रारम्भ से ही संसारव्यापी है और इसकी कार्यकारिणी में विदेशों के तीन विद्वान सदा से रहते आये हैं. जिस समय सभा की स्थापना हुई उस समय न तो हिंदी का कोई प्रामाणिक व्याकरण था और न इतिहास. सभा ने सारे हिंदी जगत के मूर्धन्य विद्वानों—यथा बाबू श्यामसुंदर दास, आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी, चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, लज्जाशंकर झा आदि के सहयोग से कामताप्रसाद गुरु से व्याकरण तैयार कराया जो हिंदी का सर्वमान्य व्याकरण है. इसी प्रकार शब्दसागर की भूमिका के रूप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल से हिंदी साहित्य का इतिहास प्रस्तुत कराया जो विश्व में आज तक अनन्य समादृत है.

  10. NPS / V.10निष्काम संकेत लिपिNishkam shorthand

    गाँधीजी के अनुरोध पर हिंदी में निष्काम संकेत लिपि प्रणाली का सभा ने आविष्कार कराया जिसके आदि विद्यार्थी लाल बहादुर शास्त्री, टी. एन. सिंह तथा अलगू राम शास्त्री थे और जिन्होंने इसके माध्यम से कटक कांग्रेस की रिपोर्टिंग की तथा संकेत लिपि विद्यालय की स्थापना की.

  11. 1934
    NPS / V.11भारत कला भवन और हिंदी का रूपBharat Kala Bhavan, and the form of Hindi

    भारत कला भवन, जो उत्तर भारत का अत्यंत महत्वपूर्ण कला-संग्रहालय है, वह नागरीप्रचारिणी सभा का है और उसने उसे काशी हिंदू विश्वविद्यालय को संरक्षण, संवर्द्धन और विकास के लिए स्थानांतरित किया. हिंदी ने विविध वैज्ञानिक विषयों पर व्याख्यानमाला का आयोजन सभा ने किया. सभा के द्वारा ही हिंदी के साहित्यकारों और विद्वानों को लेखन के लिए पद और पुरस्कारों की व्यवस्था प्रारंभ की गई. सभा ने वर्तमान हिंदी रूप को निर्धारित किया और हिंदी को बोधगम्य बनाने के लिए मूलतः संस्कृत से और अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण करने की नीति का निर्धारण किया जो भारतीय संविधान में भी ग्राह्य हुआ. नागरीप्रचारिणी सभा में एक सम्मेलन में इस रूप का निर्धारण सन् 1934 ईस्वी में किया गया था.

  12. NPS / V.12ग्रंथावलियाँ और संघर्षCollected works, and the struggles for Hindi

    नागरीप्रचारिणी सभा ने हिंदी के प्राचीन साहित्यकारों की ग्रंथावलियों का प्रकाशन किया और वे ग्रंथावलियाँ आज तक हिंदी की निधि हैं. इनकी संख्या लगभग 100 है. हिंदी के लिए सभी संघर्षों का नेतृत्व सभा ने किया और इसने ही हिंदी-हिन्दुस्तानी, आकाशवाणी की हिंदी विरोध नीति और राष्ट्रभाषा हिंदी को लेकर व्यापक संघर्ष किया.

VI

स्वतंत्रता के बाद

After Independence

स्वतंत्रता के उपरान्त इस संस्था ने अपनी गौरवशाली परंपरा को और बढ़ाया. इसके अध्यक्ष इस युग में आचार्य नरेंद्रदेव, पंडित गोविन्दवल्लभ पन्त, डॉक्टर संपूर्णानंद, डॉक्टर अमरनाथ झा, पंडित कमलापति त्रिपाठी, डॉक्टर वेणीशंकर झा, जैसे विद्वान और शिक्षाविद् हुए. साथ ही, संस्था के आजन्म संरक्षक डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, पंडित जवाहर लाल नेहरु, लालबहादुर शास्त्री थे.

सभा ने हिंदी विश्वकोश का 12 भागों में प्रकाशन किया जिसमें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कई हजार विद्वानों ने अपने निबंध प्रस्तुत किये. उनमें कुछ है डॉक्टर सी. वी. रमण, गोपीनाथ कविराज, राजगोपालाचारी, आचार्य नरेंद्रदेव, दौलतराम कोठारी, प्रोफ़ेसर वारान्निकोव, डॉक्टर संपूर्णानंद आदि. नागरीप्रचारिणी सभा ने शब्दसागर के नवीन संस्करण का प्रकाशन कराया जिसमें सन् 1965 तक व्यवहृत शब्द आ गए हैं. यह 11 भागों में प्रकाशित हुआ जो हिंदी का सर्वाधिक प्रमाणिक कोश संसार भर में माना जाता है.

नागरीप्रचारिणी सभा ने हिंदी साहित्य का इतिहास 16 भागों में प्रकाशित किया जिसे सैंकड़ों राष्ट्रीय स्तर के विद्वानों ने प्रस्तुत किया. संसार में किसी भी भाषा का इतिहास इतने विस्तृत रूप से प्रस्तुत नहीं किया गया. नागरीप्रचारिणी सभा में स्वतंत्र भारत में बैठकर जिन विद्वानों ने इन सब कार्यों में योगदान दिया और उसकी सेवा में रहे हैं. उनमें से कुछ हैं—डॉक्टर रामप्रसाद त्रिपाठी, डॉक्टर धीरेंद्र वर्मा, डॉक्टर फूलदेवसहाय वर्मा, डॉक्टर गोरखप्रसाद, डॉक्टर भगवतशरण उपाध्याय, आचार्य किशोरीदास वाजपेयी आदि.

इस संस्था ने अपने मूल से हुमायूँनामा, अकबरनामा, जहाँगीरनामा, मुग़ल दरबार, जंगनामा, हेन्संग, सलमान सौदाग, फरहान का यात्रा विवरण, प्राचीन मुद्राशास्त्र जैसे ग्रंथों का अनुवाद प्रस्तुत किया. आचार्य किशोरीदास वाजपेयी द्वारा रचित अभिनव व्याकरण सभा के तत्वावधान में रचा गया और हिंदी शब्दानुशासन नाम से प्रकाशित हुआ.

हिंदी विश्वकोश12बृहत् इतिहास16शब्दसागर (नवीन)11
FIG. VIविश्वकोश के 12, इतिहास के 16 और नवीन शब्दसागर के 11 खंड
VII

पदाधिकारी

Office-bearers

हिंदी के और भारतीय भाषाओं के उद्भट विद्वान् और साहित्यकार इसके पदाधिकारी रहे, जैसे—

  • देवकीनंदन खत्री
  • मैथिलीशरण गुप्त
  • जयशंकर प्रसाद
  • सुमित्रानंद पन्त
  • हरिवंशराय बच्चन
  • रामधारी सिंह ‘दिनकर’
  • उमाशंकर जोशी
  • अमृतलाल नागर
  • बाबुराव विष्णु पराड़कर
  • यशपाल
  • ए.पी. मैकडॉनल
  • प्रोफेसर टूची
  • प्रोफ़ेसर नॉर्मन ब्राउन
  • डॉक्टर भगवानदास
  • अम्बिकाप्रसाद वाजपेयी
  • शिवपूजन सहाय
  • हरेकृष्ण मेहताब
  • नलिनीमोहन सान्याल
  • सुनीतिकुमार चटर्जी
  • जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’
  • डॉक्टर वासुदेवशरण अग्रवाल
  • श्री नाग नागप्पा
  • श्री सत्यनारायण
  • श्रीनारायण चतुर्वेदी
  • पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल
  • हरिकेशव घोष
  • पंडित लोचनप्रसाद पांडेय
  • प्रोफ़ेसर ए. वारान्निकोव
  • राहुल सांकृत्यायन
  • सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’
  • पंडित परशुराम चतुर्वेदी
  • श्री द्वारकाप्रसाद मिश्र
  • सेठ गोविंददास
  • श्री नन्ददुलारे वाजपेयी
  • प्रोफ़ेसर गुरमुख निहाल सिंह
  • डॉक्टर मोतीचन्द्र
  • शिवप्रसाद गुप्त
  • डॉक्टर नगेंद्र
  • श्री रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’
  • प्रोफ़ेसर हरेकृष्ण अवस्थी
  • केशवप्रसाद मिश्र
  • डॉक्टर रघुवीर प्रसाद
  • सीतामऊ
  • योइची
  • जे. सौ. सेरेआको
  • सी. डब्ल्यू. डेवी
  • सी.जे. नेपियर
  • कुँवर सुरेश सिंह
  • त्रिलोचन शास्त्री
  • जॉन वाल्टन पीस
  • डॉक्टर ए.टी. अल्विन
  • आर.एस. मेक्ग्रेगर
  • आर. क्लाउडीन
  • प्रोफ़ेसर लिक्फिडलिन
  • साराकोलेन
  • टी. जिन. आटोमेवे
  • ग्रेजेव वी.जे. प्लासा
FIG. VIIपदाधिकारियों की पंजी
VIII

शताब्दी समारोह

Centenaries

सभा ने अपनी स्थापना से लेकर पचास के दशक तक हिंदी के प्रचार एवं प्रसार के लिए उत्सव किये और हिंदी की महान विभूतियों की शताब्दी उसने राष्ट्रीय स्तर पर मनाई, जिनमें कुछ के नाम इस प्रकार हैं :

  • जगन्नाथ दास ‘रत्नाकर’
  • आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी
  • बाबू श्यामसुंदर दास
  • पद्मसिंह शर्मा
  • आचार्य नरेंद्रदेव
  • डॉक्टर संपूर्णानंद
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल
  • मैथिलीशरण गुप्त
  • जयशंकर ‘प्रसाद’
  • कृष्णदेवप्रसाद गौड़ ‘बेढब बनारसी’
FIG. VIIIदस शताब्दियाँ, दस दीप

परंपरा की निरंतरताThe work continues

सभा : अब और आगेThe Sabha, now and next

एक लंबे अंतराल तक निष्क्रियता के पश्चात रंगकर्मी व्योमेश शुक्ल ने सभा की कमान सँभाली। उनके प्रधानमंत्रित्व में सभा का ज्ञानकार्य फिर गतिमान है — संरक्षण, प्रकाशन, प्रदर्शनी और लोक-जीवन में।