नागरी प्रचारिणी सभा

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Raja Shivprasad Singh Sitar e Hind Ka Hindi Vyakaran

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Adarsh Jeevan

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Description

हिंदी के सबसे बड़े आलोचक और साहित्य-इतिहासकार आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जब आत्म-निर्माण पर लिखा, तो वह उपदेश नहीं, गद्य था।

‘आदर्श जीवन’ पहली बार 1914 में नागरीप्रचारिणी सभा से प्रकाशित हुई। यह किसी अँग्रेज़ी पुस्तक का शब्दशः अनुवाद नहीं — अँग्रेज़ी ग्रंथ Plain Living and High Thinking को आधार बनाकर लिखी गई एक लगभग स्वतंत्र पुस्तक है, जिसने हिंदी को ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ जैसा मुहावरा दिया। पुस्तक छह भागों में है — पारिवारिक जीवन, सांसारिक जीवन, आत्मबल, आचरण, अध्ययन और स्वास्थ्य-विधान।

‘मित्रता’ का मूल यहीं है। यू.पी. बोर्ड की कक्षा 10 की पाठ्य-पुस्तक में पिछले पचास-साठ वर्षों से पढ़ाया जाने वाला ‘मित्रता’ निबंध और कक्षा 8 का ‘आत्मनिर्भरता’ — दोनों इसी पुस्तक से लिए गए पाठ हैं। जिस गद्य को हम अलग-अलग टुकड़ों में पढ़ते आए हैं, वह यहाँ अपने पूरे संदर्भ में उपलब्ध है।

इसी पुस्तक से सभा ने मनोरंजन पुस्तकमाला की शुरुआत की थी — एक रुपये मूल्य की, एक ही आकार की, अपने समय के योग्यतम विद्वानों से लिखवाई गई जेबी पुस्तकों की शृंखला, जिसने हिंदी के पाठक को गढ़ा। सभा अब, एक शताब्दी बाद, इसी माला को फिर से आरंभ कर रही है — और आरंभ वहीं से, जहाँ से वह पहली बार शुरू हुई थी।

यह आलोचनात्मक संस्करण मूल पाठ को उसके ऐतिहासिक संदर्भ, पाठ-भेद और संपादकीय टिप्पणियों के साथ प्रस्तुत करता है — विद्यार्थी, शोधार्थी और सामान्य पाठक, तीनों के लिए।

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