Description
नागरीप्रचारिणी पत्रिका हिंदी की प्राचीनतम शोधपत्रिका है, जिसका पहला अंक जून, 1896 में प्रकाशित हुआ था. बाबू श्यामसुंदरदास, बाबू राधाकृष्णदास, जगन्नाथ दास रत्नाकर, कार्त्तिकप्रसाद, लक्ष्मीशंकर मिश्र, बाबू देवकीनंदन खत्री, महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, बाबू रामचंद्र वर्मा, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, रायबहादुर गौरीशंकर हीराचंद ओझा, केशवप्रसाद मिश्र, पद्मनारायण आचार्य, कृष्णानंद, वासुदेवशरण अग्रवाल और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे मूर्धन्यों ने समय-समय पर इसके संपादन का दायित्व सँभाला. हिंदी के न जाने कितने क्लैसिक ग्रंथ पहले-पहल इस पत्रिका के पृष्ठों पर ही प्रकाशित हुए. गहन आत्यंतिक जाँच के बाद ही इस पत्रिका में प्रकाशन के लिये लेखों का चयन किया जाता था. पत्रिका की स्टाइलशीट, छपाई का स्तर और वर्तनी के सिद्धांत—सबकुछ—129 वर्ष पहले के भारत में एक आश्चर्य की तरह प्रस्फुटित और विकसित हुआ.
यह पत्रिका हिंदी की अपराजेय बौद्धिकता का स्मारक है. पुनर्नवांक अपनी गौरवशालिनी परंपरा के प्रति विनम्र प्रणति.
मूल्य
इस अंक की एक प्रति: तीन सौ रुपये
संस्थाओं के लिये चार सौ पचास रुपये
वार्षिक सदस्यता: पाँच सौ रुपये (डाक खर्च सहित)
संस्थाओं के लिये: आठ सौ रुपये (डाक खर्च सहित)
विदेश के लिये: सत्तर डॉलर
आजीवन सदस्यता: दस हज़ार रुपये
सदस्यता के लिए संपर्क करें : 9565101828
इस अंक के लेखक- उदयन वाजपेयी, माधव हाड़ा, ब्रजेंद्रकुमार सिंघल, नवीन प्रकाश सिंह, रवि प्रकाश, शुभनीत कौशिक, अमनदीप वशिष्ठ, विक्रम कुलकर्णी, रमण सिन्हा, चाँदनी कुमारी, धनंजय सिंह, संजय कुमार, रमाशंकर सिंह, पंकज पराशर, सैय्यद शाहिद अशरफ, तृप्ति श्रीवास्तव, अंबिकादत्त शर्मा, अभय दुबे, अरुण मिश्र, गरिमा श्रीवास्तव, विनोद तिवारी, दलपत राजपुरोहित
आवरण: मनीष पुष्कले
संपादक : राजकुमार




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