नागरी प्रचारिणी सभा

हिंदी तीर्थ : नागरीप्रचारिणी सभा

कृपाशंकर चौबे

 

आज जब भाषा–संस्थाएँ प्रायः औपचारिकता का पर्याय बनती जा रही हैं, तब नागरीप्रचारिणी सभा की बहुविध रचनात्मक सक्रियता आश्वस्त करती है कि यदि दूरदृष्टि, विद्वत्ता और प्रतिबद्धता का समन्वय हो तो ऐतिहासिक संस्थाएँ केवल अपने अतीत के सहारे नहीं जीतीं, बल्कि वर्तमान को भी दिशा देती हैं। काशी नागरीप्रचारिणी सभा के उद्धारक हैं व्योमेश शुक्ल।

व्योमेश शुक्ल प्रायः दो दशकों से काशी की विद्वत्परंपरा के प्रतिनिधि के तौर पर देश के सांस्कृतिक दृश्यालेख में सार्थक हस्तक्षेप करते आ रहे हैं। पिछले बारह वर्षों के दौरान अथक प्रयत्नों के माध्यम से हिंदी भाषा और नागरी लिपि की अभिवृद्धि के लिए स्थापित देश की सबसे पुरानी स्वयंसेवी संस्था नागरीप्रचारिणी सभा को कुप्रबंधन, लापरवाही, जड़ता, निष्क्रियता और बंदी के दुष्चक्र से बाहर निकालकर उन्होंने देश के सबसे स्पंदनशील, सक्रिय और युवा संस्थानों की पहली पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया है। इस प्राचीन काशीस्थ केंद्र में साहित्य, संगीत और कलाओं की जो चिंतन–धारा सूखकर निष्प्राण हो चली थी, अपनी बहुविध सक्रियता से व्योमेश ने उसे फिर से जीवंत, सजल और प्रवाहमय बनाया है। इसके लिए व्योमेश शुक्ल ने लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। देश भर के साहित्य प्रेमियों और लेखकों को पुनः संस्था से जोड़ा। सरकार, समाज और न्यायालय के सम्मुख नागरीप्रचारिणी सभा के ऐतिहासिक योगदान को फिर से ताजा बनाया। अपनी इस कोशिश में उन्हें सरकार, समाज और न्यायालय का खूब समर्थन मिला और व्योमेश शुक्ल संस्था के निर्वाचित प्रमुख बने।

सभा का कामकाज सँभालते ही व्योमेश के नेतृत्व में अनेक उपलब्धियाँ सामने आने लगीं। उन्होंने बहुत जतन और सूझ के साथ यशस्वी आचार्य रामचंद्र शुक्ल के क्लैसिक साहित्येतिहास–ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ का प्रामाणिक पुनर्नवा संस्करण प्रकाशित किया। हमारे यहाँ क्लैसिक कृतियों को जाँचकर उसे नई विधियों और दृष्टियों से पढ़े जाने की भावना पर ज्यादा काम नहीं हुआ है, इसलिए व्योमेश के इस प्रयत्न को अखिल भारतीय सराहना मिली। इसी तर्ज पर व्योमेश ने मुंशी प्रेमचंद की दो कहानियों ‘पंच परमेश्वर’ एवं ‘ईश्वरीय न्याय’ और आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध ‘कविता क्या है?’ को सवा सौ बरस पुरानी पांडुलिपियों के साथ प्रकाशित किया; जिन्हें उनके महत्त्व के अनुरूप केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने एक विशद समारोह में लोकार्पित किया। ये दोनों पुस्तकें भी बेजोड़ हैं और पहली बार हिंदी संसार को बतलाती हैं कि प्रेमचंद और रामचंद्र शुक्ल जैसे लेखकों के निर्माण में उनके भाषानुशासक ‘सरस्वती’ पत्रिका के कृती संपादक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी की भूमिका कितनी बड़ी थी।

व्योमेश शुक्ल ने शोध पत्रिका ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ का पुनर्नवा संस्करण भी प्रकाशित किया। सन् 1896 में प्रारंभ हुई ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ ने हिंदी के शोधपरक लेखन की एक उत्कृष्ट परंपरा निर्मित की थी। 1968 तक इसकी प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रही, किंतु उसके बाद इसकी गुणवत्ता निरंतर गिरती चली गई। लंबे अंतराल के बाद प्रो. राजकुमार के संपादन और व्योमेश शुक्ल के प्रबंध संपादन में प्रकाशित ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ 2026 का पुनर्नवांक इस गौरवशाली परंपरा की वापसी है। 434 पृष्ठों का यह अंक बीस गंभीर शोध आलेखों से समृद्ध है। यह स्पष्ट संकेत देता है कि हिंदी में उच्चस्तरीय वैचारिक पत्रिकाओं की परंपरा अभी समाप्त नहीं हुई है। सभा के मुख-पत्र ‘नागरी’ में भी स्थायी महत्त्व की सामग्री संपादक व्योमेश शुक्ल ने प्रकाशित की है।

‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ और ‘नागरी’ का पुनर्प्रकाशन और ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ तथा ‘कविता क्या है’ का प्रामाणिक पुनर्नवा संस्करण केवल प्रकाशन परियोजनाएँ नहीं हैं, वे हिंदी की बौद्धिक परंपरा के पुनर्स्थापन का सांस्कृतिक अभियान हैं।

नागरीप्रचारिणी सभा के पास हिंदी और संस्कृत की दुर्लभ और अप्राप्य पांडुलिपियों का बहुत बड़ा संग्रह है। भारत सरकार की ज्ञानभारतम् परियोजना के साथ मिलकर व्योमेश शुक्ल तुलसीदास, कबीर, मलिक मुहम्मद जायसी, कुतुबन, मंझन, रविदास, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, निराला आदि कालजयी लेखकों की पांडुलिपियों का संरक्षण और डिजिटलकरण कर रहे हैं।

व्योमेश शुक्ल सिद्ध नाट्य–निर्देशक हैं। रामायण और महाभारत के आख्यानों–उपाख्यानों को शास्त्रीय संगीत और नृत्य में विन्यस्त करके प्रस्तुत करना उनके रंगकर्म का केंद्रीय सरोकार है। उन द्वारा निर्देशित नाटकों – ‘राम की शक्तिपूजा’, ‘कामायनी’, ‘चित्रकूट’ और ‘रश्मिरथी’ के प्रदर्शनों को दुनिया भर में प्रसिद्धि और स्वीकार्यता मिली है। वर्ष 2018 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और उनकी जीवन–संगिनी की काशी–यात्रा के अवसर पर अतिथियों के लिए भारत सरकार ने उनके नाटक ‘चित्रकूट’ का एक विशेष प्रदर्शन आयोजित किया था। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इसे देखा और सराहा था।

व्योमेश शुक्ल काशी के व्याख्याता हैं। इस महान सभ्यता के चप्पे–चप्पे में छिपे हुए सांस्कृतिक औदात्य और पिछले बारह वर्षों में यहाँ हुए पुनर्नवीकरण के सम्यक बखान को उनकी पुस्तक ‘आग और पानी’ में भी पढ़ा जा सकता है, जिसे हिंदी की बेस्टसेलर पुस्तकों में गिना जा रहा है। इसका अंग्रेजी अनुवाद हाल ही में प्रकाशित होकर आया है। इसके अलावा व्योमेश शुक्ल ने बनारस पर मूर्धन्य विद्वानों द्वारा लिखित अज्ञात–अल्पज्ञात निबंधों की पुस्तक ‘काशीस्थ’ भी संपादित–प्रकाशित की है, जो इस सभ्यता के अनेक अनछुए पहलुओं को उद्घाटित करती है। व्योमेश शुक्ल के ‘पॉडकास्ट’ और ‘टॉक’ युवा पीढ़ी में बेहद लोकप्रिय हैं, उनमें से ज्यादातर बनारस के इतिहास, हिंदी भाषा और साहित्य पर केंद्रित हैं और इन्हें देखने की एक नई दृष्टि प्रस्तावित करते हैं।

‘काजल लगाना भूलना’, ‘फिर भी कुछ लोग’, ‘तुम हो कि मुकद्दमा लिखा देती हो’ जैसे बहुचर्चित काव्य-संग्रहों के एकांत स्रष्टा व्योमेश शुक्ल की कविताओं का देश की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। शीघ्र ही ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से उनके अंग्रेजी अनुवादों का एक चयन प्रकाशित होकर आनेवाला है। व्योमेश जी को भारतीय कविता के वैश्विक चेहरों में गिना जा रहा है। विश्व कविता के अनेक गंभीर मंचों पर उन्होंने देश का प्रतिनिधित्व किया है। उनकी सक्रियता के आयाम विश्वव्यापी हैं, लेकिन वे ज्यादातर समय काशी में रहकर नागरीप्रचारिणी सभा का संचालन–प्रबंधन करते हैं। नागरीप्रचारिणी सभा जैसी ऐतिहासिक महत्त्व की साहित्य संस्था पिछले पचास वर्षों के दरम्यान निष्क्रिय होकर अपनी पहचान खो बैठी थी। व्योमेश शुक्ल अपनी कल्पनाशीलता, मेहनत, वक्तृता और लेखन की शक्ति से उसे फिर से जनता के ध्यान के भूगोल में ले आए हैं।

व्योमेश शुक्ल की अभियानात्मकता से एक धरोहर संस्था फिर से प्रासंगिक हो उठी है। लोग इस साहित्यिक तीर्थ का दर्शन करने, परिसर में उपलब्ध ज्ञान संपदा का अनुशीलन करने के लिए बड़ी संख्या में आने लगे हैं। काशी की प्रसिद्धि का मुख्य कारण देवाधिदेव महादेव हैं। लेकिन इस सभ्यता का प्राचीन साहित्यिक वैभव भी देश–विदेश के अनुसंधाताओं को अपनी ओर आकर्षित करता आया है। व्योमेश जी द्वारा सभा का कामकाज सँभालने के बाद से विदेशी विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों की दिलचस्पी हिंदी और भारतीय भाषाओं के इतिहास, अतीत और महत्त्व में बढ़ गई है। व्योमेश शुक्ल के प्रयत्नों से सभा के पुस्तकालय के जरिए अनमोल हस्तलेख, पांडुलिपियाँ, प्राचीन पत्र–पत्रिकाएँ और अप्राप्त अभिलेख सोच–विचार, शोध, लेखन और चिंतन के केंद्र में आ गए हैं। व्योमेश शुक्ल के नेतृत्व में सिद्ध और नाथ साहित्य, रासो साहित्य, गोस्वामी तुलसीदास, कबीर, जायसी, दादू, पीपा आदि अनेक कवियों के जीर्ण–जर्जर हस्तलेखों का पुनरुद्धार हो रहा है और इतिहास के अँधेरे कोनों पर रौशनी पड़ रही है। व्योमेश जी ने युवाओं के बीच हिंदी के इस्तेमाल के प्रति नई भावना पैदा की है और बड़ी संख्या में उन्हें अपने अभियान से जोड़ लिया है।

 

सप्रे संग्रहालय ने डाक टिकट भेंट किया

नागरीप्रचारिणी सभा के 134 वें स्थापना दिवस समारोह में माधवराव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय, भोपाल के संस्थापक पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर की तरफ से राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, प्रमुख धर्माचार्य आचार्य मिथिलेशनंदिनीशरण और संपादक–पत्रकार हेमंत शर्मा ने सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल को ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ के 200 वर्ष पूरे होने पर भारत सरकार की ओर से जारी विशेष डाक टिकट भेंट किया।

 

 

सभा की युवा बिग्रेड

नागरीप्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल की युवा बिग्रेड के अनन्य सदस्य हैं– तापस शुक्ल, शाश्वत त्रिपाठी, स्वाति विश्वकर्मा, नंदिनी विश्वकर्मा, आकाश देववंशी, विनायक दहिया, मनीष त्रिपाठी, विशाल पटेल, प्रभव पंकज, साखी शुक्ला, ऋषिका चौबे, सानिया और अपूर्वा। यह बिग्रेड सभा के सांस्कृतिक अभ्युत्थान को समूचे हिंदी समाज का अभियान बनाने में जुटी है।

 

केंद्रीय विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों का एक दर्जन वृत्त चित्र

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के जनसंचार विभाग के स्नातक अंतिम वर्ष के 12 विद्यार्थियों ने 2026 में इंटर्नशिप के तहत नागरीप्रचारिणी सभा की हाल की उपलब्धियों विशेषकर उसके नए प्रकाशनों पर अलग–अलग 12 वृत्त चित्रों का निर्माण किया।

 

कर्मवीर, भोपाल, अगस्त 2026 में प्रकाशित