साहित्य
साहित्य के आचार्य डॉक्टर हजारीप्रसाद द्विवेदी ज्योतिष के भी आचार्य हैं, पर हिंदी साहित्य के भविष्य का अनुमान लगाने के लिये ‘दिनमान’ ने उन्हें आमन्त्रित किया तो इस आधार पर नहीं। फलित ज्योतिष नहीं, फलित विज्ञान को ही आधार बना कर उन से प्रश्न पूछे गए थे; उन्होंने जो उत्तर दिये वे भी यह मान कर कि “प्रतिक्षण घटने वाली घटनाओं में सातत्य या धारावाहिकता लाने में, मनुष्य का सोचने-समझने वाला, अनुमान करने वाला या अंदाज़ा लगाने वाला और रूप-सर्जन करने वाला चैतन्य ही एकमात्र प्रमाण है। यह मनुष्य को विधाता की दी हुई तीसरी आँख है। . . . मनुष्य की प्रवृत्ति-प्रदत्त दो आँखें देश में सीमाबद्ध हैं, जब कि तीसरी आँख काल में सीमाबद्ध है।”
साहित्य के भविष्य की चर्चा में हमारा यह प्रयास रहता है कि अधिकतम निकट और अवितथ भविष्य का अंदाज़ा हम लगायें। वह ठीक ही उतरेगा, यह कहना कठिन है— शायद अनुचित भी। पर डॉक्टर द्विवेदी के इस कथन से हम पूरी तरह सहमत हैं कि “जो कुछ हमें दिखाई देता है उसका उतना महत्त्व नहीं है जितना हमारी देख पाने की व्याकुलता का है।” इस व्याकुलता की उपलब्धियाँ निश्चय ही हमारे पाठक के लिये अत्यन्त रोचक होंगी।
—अज्ञेय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय
गीता में बताया गया है कि किसी कार्य के प्रत्यक्ष घटित होने के पाँच कारण हैं : 1. वह देश और उस की प्रकृति जिस में घटी है; 2. स्वयं करने वाला या करने वालों की योग्यता; 3. तत्काल उपलब्ध साधन जिसमें कर्त्ता की मानसिक स्थिति भी शामिल है; 4. उसकाल में और उस स्थान पर रहने वाले लोगों या वस्तुओं की भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएँ या चेष्टाएँ; और 5. ऐसी प्राकृतिक शक्तियाँ जो मनुष्य के नियंत्रण में नहीं हैं, और जिसे किसी अच्छे शब्द के अभाव में “दैव” कह कर संतोष कर लिया जाता है। ये पाँचों कारण अतीत, वर्तमान और भविष्य में किसी कार्य के घटित होने के लिये उत्तरदायी हैं। इतिहास की संरचना में जो ग़लतियाँ होती हैं—उन का कारण है इन पाँचों में से एक या दो या अधिक के विषय में जानकारी का अभाव। जब इनमें से कोई जानकारी अधिक स्पष्ट रूप में मिल जाती है, तब इतिहास में संशोधन की आवश्यकता हुआ करती है।
सन् दो हज़ार ईस्वी में हिंदी साहित्य की क्या स्थिति होगी, इसका भी अंदाज़ा इन्हीं पाँच बातों को ध्यान में रख कर लगाया जाना चाहिए। अब से लगभग एक-तिहाई शताब्दी में क्या कुछ होने वाला है, उसे पिछली 2-3 शताब्दियों में जो कुछ हुआ है, उस के आधार पर ही अनुमान का विषय बनाया जा सकता है। आज से 33 वर्ष पहले किसी को यदि 1967 की हिंदी साहित्य की स्थिति पर विचार करना होता तो कदाचित् वह सोच भी नहीं सकता था कि सन् 1967 में भारतवर्ष के दो टुकड़े हो गए होंगे और पाकिस्तान और हिंदुस्तान इन दोनों टुकड़ों में नित्य वैर जैसा दिखनेवाला भाव पैदा हो गया होगा। सन् 1965 में पाकिस्तानी आक्रमण के समय जिस प्रकार का विक्षोभ लेखकों के मन में उत्पन्न हुआ और उस के कारण जिस प्रकार का साहित्य लिखा गया, वह उस समय के भविष्य-वक्ता के लिये अज्ञेय था। परंतु इतना उस समय भी उसे पता था कि हिंदू और मुसलमान इन दो प्रमुख सम्प्रदायों में तनातनी बढ़ रही है और यह तनाव किसी-न-किसी अशुभ परिणाम की सृष्टि अवश्य करेगा। इसी प्रकार आज का मनुष्य कुछ विशेष प्रकार के तनाव का अनुभव जरूर कर रहा है और यह तनाव कोई-न-कोई रूप लेगा, यह भी निश्चित है। परंतु क्या रूप लेगा, यह निश्चयपूर्वक कोई नहीं कह सकता।
हिंदी भाषा और साहित्य का घनिष्ठ सम्बन्ध भारतवर्ष की अखंडता, एकता और समृद्धि से है। क्या यह देश, एक और अखंड बना रहेगा? जिस विषम आर्थिक संकट के भीतर से हम गुज़र रहे हैं, उसका कहीं अंत भी है या नहीं? क्या होने वाला है इस देश का?
जब से भारतवर्ष स्वतंत्र हुआ है तब से वह भाषा के क्षेत्र में एक प्रकार का मानसिक तनाव अनुभव करने लगा है। भाषावार प्रांतो के पुनर्गठन के बाद पृथक्-पृथक् सभी क्षेत्रीय भाषाओं को समान महत्त्व देने की माँग बढ़ रही है। हर भाषा में पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षाएँ हों और विश्वविद्यालयों की उच्चतम शिक्षा की व्यवस्था हो, यह आकांक्षा अधिकाधिक प्रबल रूप में प्रकट होने लगी है। पार्लमेंट में हर भाषा को समान मर्यादा देने का प्रस्ताव भी क्रमशः दृढ़ स्वर में व्यक्त किया जाने लगा है। इसी प्रकार देश के विभिन्न खंडों में अधिकाधिक स्वतंत्र इकाई होने की लालसा निरन्तर बढ़ रही है। कई बार हिंदी-प्रेमी इन बातों से चिंतित होते हैं। परंतु इससे हिंदी की कोई हानि होगी, ऐसी आशंका मुझे नहीं है। वस्तुतः देश की अन्य सभी भाषाओं की स्वतंत्र और समान मर्यादा की माँग अंग्रेज़ी के विरुद्ध जाएगी और हिंदी 15 भाषाओं में एक होने पर भी इनमें सबसे अधिक समृद्ध और शक्तिशाली रहेगी—इस विषय में संदेह की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि लगभग आधे भारतवर्ष की भाषा वह तब भी रहेगी। और यदि इस माँग ने इतना उग्र रूप नहीं धारण किया कि इस देश की एकता ही संकट में पड़ जाये तो इतना निश्चित है कि वही सारे देश में सम्पर्क भाषा के रूप में स्वीकृत होगी। कभी-कभी यह आशंका होती है कि स्वयं हिंदी प्रदेशों में स्थानीय बोलियों को भाषा की मर्यादा देने की माँग प्रबल हो रही है। यह प्रवृत्ति यदि अपनी तर्क-सम्मत परिणति की ओर जाये तो चिंता का विषय हो सकती है। लेकिन इससे भी निराश या चिंतित होने की बात नहीं है। इन बातों से हिंदी प्रदेशों की एकता के नष्ट होने की संभावना या देश की अखंडता के भी नष्ट होने की आशंका नहीं है। भाषाई विभेद और जाति-पाँति का मनोभाव अधिक दूर तक चल नहीं सकता। इसके दो कारण हैं। दोनों ही देश के दुर्भाग्य के निदर्शक हैं, परंतु मेरा अनुमान है कि ये आगामी 10-15 वर्षों में कम होने लगेंगे। एक दुर्भाग्य तो हमारी वर्तमान आर्थिक स्थिति ही है। यह आर्थिक स्थिति कुछ तो हमारे देशवासियों के सामूहिक प्रयत्नों की शिथिलता, दुर्व्यवस्था और सामाजिक जीवन के प्रति अस्वस्थ दृष्टिकोणों के कारण उत्पन्न हुई है, परंतु बहुत-कुछ विकासशील देश के लिये अनिवार्य भी है। व्यक्तिगत संपत्ति संचय करने की अस्वस्थ मनोवृत्ति, जड़ता, आलस्य, अनुशासनहीनता, अनास्था आदि से बहुत हानि हुई है। इसका बहुत बड़ा दुष्परिणाम यह है कि संवेदनशील युवकों के चित्त में एक विचित्र प्रकार का अजनबीपन, संत्रास, असहाय वृत्ति और निराशा का वातावरण प्रस्तुत हुआ है। इस मनोवृत्ति से उत्पन्न हुआ साहित्य पुराने मूल्यों के अनुसंधान को व्यर्थ का प्रयास मानने लगा है और संपूर्ण सभ्यता को ही कृत्रिम, प्रपंचपूर्ण और मृगमरीचिका के रूप में देखने लगा है। वस्तुतः इस भ्रष्टप्राय व्यवस्था के सामने कोई बहुत बड़ा लक्ष्य नहीं है। ऐसा लगने लगा है कि वह कुछ लोगों के हाथ का खिलौना-मात्र है और इसके सामने किसी-न-किसी प्रकार अपना पेट भरने और तोंद फुलाने के सिवा और कोई लक्ष्य ही नहीं है। उसका संवेदन बिल्कुल थोथा हो गया है। हृदय नाम की चीज़ उस के पास है ही नहीं। है तो केवल विकराल मुख और भयंकर पेट।
अजनबीपन, प्रेम के अभाव का द्योतक है; संत्रास भविष्य की उज्ज्वलता के विषय में निराशा का परिणाम है और अनास्था समाज के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले लोगों के आचरणों के भोग-परायण होने का फल है। इसमें आशा का केवल एक ही स्थान है—वह है साधारण जनता का स्वस्थ मनोबल। पिछली दशाब्दी की घटनाएँ संकेत करती हैं कि साधारण जनता इसे अधिक बर्दाश्त करने की स्थिति में नही है। मेरा विश्वास है कि आगामी 20-22 वर्षों में निस्संदेह साधारण जनता के गर्भ से शक्तिशाली महामानव उत्पन्न होगा। मनुष्य की जिजीविषा बहुत प्रबल होती है। जैसी स्थिति इस समय है, उसमें जीना ही दूभर हो गया है। इस लिए शीघ्र ही इस की प्रतिक्रिया किसी-न-किसी रूप में प्रकट होगी। इस देश के इतिहास को देखते हुए मैं इस प्रकार की जन-क्रांति की बात नहीं सोच सकता जैसी कि पश्चिम के कई देशों में हुई है। भारत की क्रांति सदा भोग-परांगमुख और त्यागमूलक मूल्यों का अनुसरण करती रही है और वह अब भी उन्हीं उपायों पर बल देगी जो रचनात्मक होंगे। सौभाग्यवश उसका बीजारोप हो गया है। वह उपाय है आधुनिक वैज्ञानिक साधनों के प्रयोग से देश के पर्वतों और नदियों, जंगलों और रेगिस्तानों के भीतर दबी हुई अपार संपति का उद्घाटन। जो महामानव नेता आगामी 20-25 वर्षों के भीतर ही आनेवाला है, वह कानूनी बहसों के चक्कर में नहीं पड़ेगा; इस और उस देश की ओर उन्नति के मंत्रों की खोज नहीं करता फिरेगा। वह देश की मिट्टी से पैदा होगा और देश की मिट्टी को अपना संबल बनाएगा। भारतवर्ष समस्त साधनों से परिपूर्ण अपने ढंग की अद्वितीय इकाई है। जिस आर्थिक अवसन्नता के चक्कर में हम फँस गए हैं, उससे उबरने का एक-मात्र मार्ग देश की अखंडता है। टुकड़ों में बँट कर यह दे छिन्न मेघ की तरह बरबाद हो जाएगा। परंतु एक बना रह कर अपार संपत का अधिकारी होगा। बड़ी-बड़ी योजनाओं का सूत्रपात हो गया है, लेकिन भविष्य में इनसे भी अधिक महत्त्वपूर्ण और बड़ी योजनाएँ देश को एक सिरे से दूसरे सिर तक कसकर बाँध देंगी। आज देश का काफ़ी बड़ा हिस्सा प्रतिदिन, अनवरत रेलों और बसों में यात्रा करता है। एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश में जाने को बाध्य हैं—और भी अधिक बाध्य होंगे। भाषाओं की संकीर्ण सीमा निश्चित रूप से टूटेगी। एक प्रदेश दूसरे प्रदेश के निकट आने को बाध्य है। यह दुर्भाग्य आगामी बीस वर्षों में हमारे लिए वरदान सिद्ध होगा। भारतवर्ष अपने आप को खोजने लगा है और जिस दिन खोज लेगा, उस दिन अजनबीपन और संत्रास समाप्त हो जाएंगे। सुंदर भविष्य के निर्माण का स्वप्न जब थोड़े से सुविधाभोगी हाथों से निकल कर देश की कोटि-कोटि जनता के हाथों में आ जाएगा तो पुराने मूल्यों के प्रति विद्रोह तो होगा ही नहीं, उनके प्रति नई आस्थाएँ उत्पन्न होंगी और उन्हें नए संदर्भ में नई शक्ति प्राप्त होगी। मेरा विश्वास है कि सन् दो हज़ार ईस्वी आने के पहले आशा और उत्साह की लहर एक छोर से दूसरे छोर तक व्याप्त हो जाएगी। आर्थिक विषमता और दुर्व्यवस्था का जो घिनौना रूप आज प्रकट हुआ है, उसका पेट फाड़ कर नई व्यवस्था जन्म लेगी और उससे प्रेरित नए साहित्य में अधिक स्वस्थ और सबल स्वर सुनाई देगा।
इस प्रकार, देश की विषम आर्थिक स्थिति जितनी भी भयंकर हो, उसी में भावी भारत की एकता और अखंडता की आशा का बीज है। जो लोग भावुकतावश क्षेत्रीय बिलगाव का राग अलापने लगे थे वे भी समझने लगे हैं कि कल्याण एकता और अखंडता में है। जैसे-जैसे उग्र राजनैतिक दल उत्तरदायित्व का काम सँभालने का अवसर पाएंगे, वैसे-वैसे उनकी बिलगाव की नीति समाप्त होती जाएगी।
एक दूसरी बात भी है। जात-पाँति, प्रांतीयता, क्षेत्रीयता आदि भी उभरी है। जब नया अंकुर के रूप में प्रकट होता है तो छिलका उसके सिर पर सवार होता है। हमारी स्वाधीनता के अंकुर की भी यही हालत है। छोटी-छोटी जड़ता की खाल हमारे सिर पर सवार हो गयी है। परंतु अंकुर जरा शक्तिशाली होगा तो यह अपने आप इस छिलके को झाड़ कर फेंक देगा। स्वाधीन भारतवर्ष पर दो विदेशी आक्रमण हो चुके हैं और प्रच्छन्न विदेशी आक्रमण का तो ताँता बंधा हुआ है। जो दो आक्रमण खुल कर हुए हैं, उन्होंने देश को एक सिरे से दुसरे सिरे तक झकझोरा है। पर बुद्धिमान कहे जाने वाले लोगों की अपेक्षा उपेक्षित जनशक्ति ने ही डटकर उनका मुक़ाबला किया है। देश पहले से शक्तिशाली हुआ है। इससे आशा बँधती है कि देश की प्राण शक्ति अविच्छिन्न और अखंड है। वह समय पर जाग सकती है और उचित दिशा में आगे बढ़ सकती है। प्रच्छन्न आक्रमणों का पता साधारण जनता को लग ही नहीं पाता और लगता भी है तो देर से। जो साहसी नेतृत्व उत्पन्न होने वाला है, वह देश की जनता को गुप्त और प्रच्छन्न आक्रमणों के समय साथ ले कर चलेगा, क्यों कि वह झूठी कूट-नीतियों में विश्वास नहीं करेगा।
इन सब बातों को देखने से लगता है कि आगामी 20-25 वर्षों में देश के संवेदनशील चित्त में संत्रास की जगह आस्था, अजनबीपन की जगह प्रेम और आशंका के स्थान पर विश्वास की तरंगें हिल्लोलित होंगी। दीर्घकाल तक हम साँस रोक कर नहीं रह सकते। इस समय का विक्षुब्ध वातावरण फट जाने को बाध्य है। यह संचित विक्षोभ कुछ तोड़-फोड़ कर नई आस्था की संजीवनी को अपना स्थान देगा। निस्संदेह उस समय साहित्य में अपूर्व शक्ति आएगी और इस समय जो पिछलग्गू बनने की प्रवृत्ति है, उसके स्थान पर संसार के साहित्य को नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता आएगी। आज हम अनुकर्त्ता हैं—दूसरों के अनुकरण पर सोचते, बोलते और लिखते हैं। हममें अपनी समृद्ध विरासत के प्रति न तो किसी प्रकार का प्रेम ही बच रहने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं और न ममता का भाव ही शेष रह गया जान पड़ता है। जिस दिन हम अपने को अतीत के इतिहास के साथ सही अर्थों में जोड़ देंगे, उस दिन हमारा भविष्य भी सुनहरा और उज्ज्वल हो कर प्रकट होगा।
ऊपर प्रसंगवश साहित्यकारों की थोड़ी-सी चर्चा हो गयी है। यहाँ उसे विशेष रूप से ध्यान में रखकर कुछ कहने का प्रयत्न किया जा रहा है। अगर 20वीं शताब्दीको 3 हिस्सों में बाँट दें तो प्रथम तिहाई का साहित्य बहुत अधिक स्वदेशी जान पड़ेगा। उस समय के साहित्यकार विदेशी भाषा और रीति-नीति से उतने अधिक प्रभावित नहीं थे जितने कि दूसरी तिहाई में हो गए। दूसरी तिहाई में हिंदी-भाषी प्रदेशों में अंग्रेज़ी शिक्षा पहले की अपेक्षा अधिक बद्धमूल हुई है। अंग्रेज़ी शिक्षा के कारण जहाँ नव-शिक्षितों में मानसिक क्षितिज का विस्तार हुआ, वहाँ एक नया दोष यह आ गया कि वे देश के बृहत्तर समाज से कटते गए। यह दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि शिक्षित जनता के मानसिक क्षितिज का विस्तार साधारण जनता के लिये अपरिचित ही बना रहा। उनकी भाषा, शैली, वक्तव्य, वस्तु सभी कुछ ऐसे होने लगे जिनकी जड़ें देश की मिट्टी में गहराई तक नहीं पहुँच पाई। परंतु फिर भी उन्होंने देश की जनता की संवेदना को कुछ-न-कुछ परिष्कृत किया अवश्य। सन् 1936 के बाद हमारे साहित्य में विस्तार तो बहुत आया, परंतु ऐसी रचनाएँ बहुत कम हुईं जो आगामी 33 वर्षों में याद की जा सकें। अधिक से अधिक वे परीक्षाओं में बैठने वाले उपाधिकामी विद्यार्थियों के अध्ययन तक ही सीमित रहीं। परंतु निश्चित रूप से उन्होंने क्षेत्र-निर्माण का काम किया। यद्यपि उनकी भाषा और उपस्थापन-पद्धति अंग्रेज़ी से बहुत अधिक प्रभावित है और साधारण जनता की भाषा और उपस्थापन-पद्धति से बहुत दूर पड़ जाती है तो भी नवीन अभिव्यक्ति देने में समर्थ भाषा के निर्माण में उनका योगदान उपेक्षणीय भी नहीं है। यह और बात है कि कवि और लेखक, अपने मन के किसी अंतराल में ऐसी आशंका को पोसते आए हैं कि उनकी बात साधारण जनता नहीं समझ सकेगी। यही कारण है कि प्रत्येक कवि और कहानी-लेखक अपनी कविता और कहानी के साथ लम्बे-लम्बे वक्तव्य दिया करते हैं। यह वक्तव्य उसी आशंका के फल हैं। इसका प्रमुख कारण यही है कि कवि या लेखक के मन में अपनी कविता या कहानी के बारे में यह संदेह है कि वे उसकी बात स्पष्ट कर सकेंगी। इन वक्तव्यों से मूल कहानी या कविता की शक्ति का चाहे पता न लगा हो, परंतु उनसे साधारण पाठक के मन का विस्तार अवश्य हुआ है और इसका शुभ परिणाम आगामी 30 वर्षों में दिखाई देगा। निस्संदेह आगे चलकर कवि सवक्तव्य कविता लिखने की अपेक्षा कविता ही ऐसी लिखेंगे जिस में संप्रेषणीयता, वक्तव्य की तुलना में, कहीं अधिक होगी। तभी साधारण जनता उसे अधिक उत्सुकता और आग्रह के साथ ग्रहण करेगी, क्योंकि ऐसी कहानियाँ और कविताएँ “स्वस्थ” होंगी। ‘स्व-स्थ’ अर्थात् अपने आप में स्थित, किसी बाहरीवक्तव्य या शास्त्र-ज्ञान में नहीं।
इस बीच ज्ञान का साहित्य प्रचुर मात्रा में लिखा जाएगा। जब हिंदी उच्चतम शिक्षा, उच्चतम न्याय और उच्चतम विधान की भाषा होगी, तब निस्संदेह उसकी अभिव्यंजना शक्ति अकल्पनीय ढंग से शक्तिशाली होगी। इन दिनों शब्द-निर्माण के जो कृत्रिम प्रयत्न हो रहे हैं, उनके स्थान पर भाषा में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये सहज भाव से “स्व-स्थ” शब्दों का अधिकाधिक प्रचलन होगा।
पद्य का साहित्य मुद्रण यंत्र के आविष्कार और प्रचलन के बाद बहुत परिवर्तित हुआ है, क्योंकि कविता कान का विषय न रह कर आँखों का विषय बनती गयी है। उसमें काकु, वक्रोक्ति आदि को प्रकट करने के लिये नए-नए चिह्नों का आविष्कार हुआ है। छपाई को प्राविधिक विशेषताओं से, जैसे पंक्तियों को तोड़कर, बीच में “स्पेस” दे कर, पर-वाक्य निदर्शक, प्रश्नवाचक और विस्मय-वाचक चिह्नों की योजना करके भाव प्रकट करने के प्रयास हुए हैं। छंद के बंध शिथिल हुए हैं और कवि-मानस में प्रवाहित होने वाले लय को पाठक के चित्त में दिगंतरित करने का प्रयास हुआ है। वर्तमान काल में मुद्रण यंत्र के प्रतिद्वंदी रेडियो आदि श्रुतिग्राह्य यंत्रो का आविष्कार हुआ है और उनके कारण काव्य, नाटक, कथा आदि की अभिव्यक्ति में कुछ थोड़े-थोड़े प्राविधिक परिवर्तनों का आभास मिला है। टेलीविजन के आविष्कार से चक्षुर्ग्राह्य विषयों की प्राविधिक विशेषताएँ भी सामने आई हैं। भविष्य में जब शब्द संचार के अधिक शक्तिशाली साधन उपलब्ध होंगे, पृथ्वी के ऊपर उपग्रहीय स्टेशनों से विविध भाँति के राग-लय समन्वित साहित्य का प्रसारण होगा, तब मुद्रण यंत्र का एकच्छत्र आधिपत्य उससे अवश्य प्रभावित होगा।
इससे “शब्द-और-अर्थ का साहित्य” नया रूप ग्रहण करेगा। जितना ही काव्य श्रुति-ग्राह्य बनेगा उतना ही उसमें छंद और लय की महिमा प्रतिष्ठित होगी। यद्यपि यह आवश्यक नहीं है कि वह छंद पिंगल मुनि के छंदोंविधान के अनुकूल ही हो। परंतु इतना निश्चित है कि मुद्रण यंत्र की महिमा का एकातपत्र राज्य कमज़ोर होगा और पद्य का साहित्य चक्षुर्ग्राह्य विषय बनने के बंधन से बहुत दूर तक मुक्त होगा। इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि कवि-सम्मेलनी कविताओं के दिन लौटेंगे। इसका मतलब केवल यह है कि कविता में छंद का महत्त्व बढ़ेगा। वह छंद और लय की सहायता से अभिधेयार्थ से कहीं अधिक को व्यक्त करने की ओर अग्रसर होगी।
क्या कविता उसी प्रकार का प्रमुख साहित्यांग बनी रहेगी जैसी अब तक रही है? सन्देह है। वह प्रमुख साहित्यांग नहीं रहेगी, परंतु प्रभावशाली अवश्य रहेगी?
जब मनुष्य आदिम स्थिति में था, उसकी भाषा में वर्णों का इतना स्पष्ट विच्छेद नहीं था। वे बहुत-कुछ एक दूसरे से मिले हुए संगीतात्मक स्थिति में थे। लेकिन जैसे-जैसे मनुष्य सभ्यता की ओर अग्रसर होता गया, वैसे-वैसे विविक्त ध्वनियों वाले वर्णों और उन विविक्त वर्णों से बने हुए शब्दों का प्राचुर्य होता गया और भाषा अर्थ-प्रधान अर्थात् गद्यात्मक होती गयी। भाषा का संगीत अथवा शब्द-गुणप्रधानता मद्धिम पड़ती गई। भाषा में अर्थ-योजन का भार बढ़ता ही चला गया। कविता विविक्त ध्वनि वाले वर्णों की भाषा से खो गए हुए संगीत को पुनः प्राप्त करने का प्रयास था। इसी प्रयास को छंद कहते हैं। आधुनिक युग में गद्यात्मक भाषा की शक्ति और भी बढ़ी है और उसकी खोई हुई संगीतात्मकता और भी अधिक खोती जा रही है। यह गति और भी तीव्र होगी। व्यक्तिगत निबंधो और कहानियों में जो अर्थातीत लय की संभावना अब भी बच रही है, वह धीरे-धीरे क्षीणतर होती जाएगी। सन् 2000 ईस्वी में गद्य की और भी बहुत-सी विधाएँ प्रकट होंगी और काव्य में भी लय का स्थान सूक्ष्म के सूक्ष्मतर होता चला जाएगा। प्रतिक्रिया के रूप में कई बार गीत सिर उठाएंगे, परंतु गीत-तत्त्व अधिकाधिक काव्य से बहिष्कृत हो कर संगीत के क्षेत्र में चला जाएगा। कहानी में राग-तत्त्व क्रमशः शिथिल होता जाएगा और अर्थाभार से बोझिल रचनाएँ बढ़ती जाएंगी।
परंतु यथार्थवाद का जो वर्तमान रूप है, वह बहुत दिनों तक ज्यों-का-त्यों नहीं बना रहेगा। यदि देश की स्थिति आर्थिक दृष्टि से कुछ सम्पन्न हुई जिस की पूरी संभावना है, तो मनुष्य की दृष्टि सतही यथार्थवाद से ज़रूर विद्रोह करेगी और मनुष्य-जीवन की सफलता (जिसे अंग्रेज़ी में सक्सेस (success) कहा जाता है) के संबंध में अधिक चिंतित न होकर उसकी चरितार्थता के बारे में सोचने को अग्रसर होगी। सन् दो हज़ार ईस्वी का साहित्य आधुनिक अर्थ में यथार्थ नहीं होगा। वह बहुत कुछ चरितार्थवादी के रूप में प्रकट होगा। यथार्थवाद जीवन की सफलता या सार्थकता के बारे में परेशान रहता है, जबकि चरितार्थवाद मनुष्य जीवन की चरितार्थता के बारे में दृढ़ आस्था रखेगा।
पुराने मूल्यों के प्रति जो अनास्था का भाव आया है उसके मूल में विद्यमान विरूप परिस्थितियाँ हैं। इन मूल्यों का संदर्भ के अनुकूल रूपांतरण होगा। भारतवर्ष में, और सच पूछिए तो सारे संसार में, ऐसा बराबर होता आया है। भारतवर्ष की विशेषता यह रही है कि यहाँ यह काम चुपचाप हुआ है, भाष्यों और व्याख्याओं के द्वारा। अब शायद उतना चुपचाप और उसी पद्धति से ऐसा नहीं होगा। पर ढोल पीट कर भी नहीं होगा। पुराने प्रतीकों को नए संदर्भों में नया अर्थ देकर ऐसा किया जाने लगा है। और भी अधिक मात्रा में किया जाएगा।
परंतु यदि अणु अस्त्रों की मारामारी शुरू हो गई, संसार महा प्रलय का शिकार हो गया तो इन मनमोदकों से क्या भूख मिटेगी? प्रश्न यह है कि क्या प्रथम दो महायुद्धों के समान तीसरा महायुद्ध भी निकट भविष्य में हो सकता है? जिस प्रकार मनुष्य-चित्त की संकीर्णता ऊपर उठती आ रही है उसे देखते हुए लगता है कि आगामी 33 वर्षों में युद्ध के कई घिनौने दृश्य देखने को मिलेंगे। इसका कारण यह है कि यद्यपि आधुनिक साधनों ने विभिन्न देशों को बहुत नज़दीक ला दिया है तो भी पूरा मानव समाज सभ्यता के एक ही स्तर पर नहीं है। कुछ लोग बहुत आगे बढ़ गए हैं, कुछ लोग बहुत छटपटा रहे हैं—बीच में न जाने कितने स्तर हैं। सबका स्वार्थ एक ही ओर बढ़ने और न बढ़ने में नहीं है। इसलिए संघर्ष अवश्यम्भावी है। परंतु व्यापक विश्वयुद्धों की संभावना दिन पर दिन कम होती जा रही है। मनुष्य के पास ऐसे भयंकर मरणास्त्र आ गए हैं कि यदि बड़ी शक्तियों में सचमुच का युद्ध छिड़ गया तो पूरी सभ्यता ही समाप्त हो जायेगी। और उस हालत में इस प्रकार के ऊहात्मक लेखों का कोई मूल्य नहीं रह जायेगा। आशा करनी चाहिए कि सभ्यता विध्वस्त नहीं होगी, महायुद्ध नहीं होगा और आशंका करनी चाहिए कि खंड-युद्धों का ताँता बँधा रहेगा। विभिन्न देशों की आतंरिक व्यवस्था में भी रह-रह कर विस्फोट होता रहेगा। परंतु इससे साहित्य को नई-नई शक्ति भी प्राप्त होती रहेगी।
आगामी 33 वर्षों में हिंदी साहित्य स्वस्थ होगा अर्थात् देश के भीतरी जन-जीवन की उगती हुई आकांक्षाओं के साथ कदम रखता हुआ आगे बढ़ेगा। आज का साहित्य जितनी मात्रा में जन-जीवन से विच्छिन्न है, उतनी मात्रा में वह अस्वस्थ भी है। परंतु वह धरती को छोड़ कर जी नहीं सकता और दीर्घकाल तक व्योम विहारी बनने की स्थिति में नहीं रह सकता। जहाँ तक रचनात्मक साहित्य का प्रश्न है, वह अधिकाधिक जन-जीवन के संपर्क में आएगा और जन-जीवन की चरितार्थता की खोज में अधिकाधिक संलग्न होगा।
परंतु ये सब बातें ज्यों-की-त्यों नहीं घटेंगी। बहुत-सी बातें मनुष्य के नियंत्रण से परे हैं और मनुष्य के सोचने की शक्ति के भी अतीत हैं। जैसा कि ऊपर कहा गया है इस अतिमानवीय शक्ति को अधिक अच्छे शब्दों के अभाव में “दैव” कहा गया है। न जाने कब से ज्योतिषी “दैवज्ञ” होने का दावा करता आया है। लेकिन वस्तुतः “दैव” मनुष्य की जानकारी के परे रहता है। वह अप्रतिरोध्य ही नहीं, अज्ञेय भी होता है। दैवज्ञ का मतलब है अज्ञेय को जानने वाला, अज्ञेयज्ञ! इस लिए यह शब्द स्वतोव्याहत एक सुश्राव्य शब्द-मात्र है। उसके बारे में मौन रहना ही अच्छा है।